
इलाहाबाद हाई कोर्ट में जजों और हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के बीच चल रहा गतिरोध अभी भी बना हुआ है। इसकी वजह से वकीलों ने गुरुवार को भी कार्य का बहिष्कार किया। बार एसोसिएशन ने 9 जुलाई को ही काम नहीं करने का प्रस्ताव पारित किया था।
वकीलों का आरोप है कि उनके सामने आने वाले कुछ मुद्दों, खासकर बार के प्रति कुछ जजों के आचरण से जुड़ी समस्या का समाधान करने में हाई कोर्ट प्रबंधन विफल रहा है। इसलिए, बार एसोसिएशन ने फिलहाल काम नहीं करने का फैसला किया है।
बार एसोसिएशन ने एक बैठक कर कड़े शब्दों में एक प्रस्ताव पारित करते हुए कहा कि बार “खुद को भगवान मानने वाले कुछ माननीय न्यायाधीशों द्वारा किए जा रहे अंदरूनी हमले से” न्यायपालिका को बचाना चाहता है । बार एंड बेंच के मुताबिक, इस प्रस्ताव में कहा गया है, “यह संकल्प लिया गया है कि हाई कोर्ट न्याय का मंदिर नहीं, बल्कि न्याय की अदालत है और न्यायाधीश भी भगवान नहीं बल्कि लोक सेवक हैं, जिसके लिए उन्हें सरकारी खजाने से वेतन दिया जाता है और उन्हें आम जनता की सेवा के लिए नियुक्त किया जाता है। हम उन्हें भगवान मानने से इनकार करते हैं।”
प्रस्ताव में सभी वकीलों से आग्रह किया गया है कि वे न्यायाधीशों को ‘ माई लॉर्ड’ या ‘योर लॉर्डशिप’ कहकर संबोधित न करें। हालांकि, प्रस्ताव में कहा गया कि वकील किसी भी सर्वनाम जैसे “सर, योर ऑनर या मैनी” का उपयोग कर सकते हैं। अपने प्रस्ताव में हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ के हालिया बयान का भी हवाला दिया है , जिसमें सीजेआई ने अदालतों को “न्याय का मंदिर” कहे जाने पर अपनी आपत्ति जताई थी थी और कहा था कि न्यायाधीशों द्वारा स्वयं को उन मंदिरों के देवता समझ लेना एक “गंभीर खतरा” है।
बार एसोसिएशन ने अपने निर्देश का उल्लंघन करने वाले वकीलों को कार्य निलम्बित करने की चेतावनी भी जारी की है, जिनमें वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से मामलों पर बहस करने वाले वकील भी शामिल हैं। ‘बार एसोसिएशन’ ने कहा, “कुछ अदालतों का आचरण अड़ियल है और न्याय का रथ केवल एक पहिये पर नहीं चल सकता। अधिवक्ताओं का आए दिन अपमान किया जाता है।”
‘बार एसोसिएशन’ द्वारा प्रस्ताव पारित किया गया कि जिन अधिवक्ताओं ने एसोसिएशन के जनादेश का उल्लंघन किया है, उन्हें नोटिस जारी किया जाएगा लेकिन कार्यकारी समिति ने इस आह्वान में योगदान करने वाले अधिवक्ताओं का आभार प्रकट किया।