
इस चुनाव में जिस भी पार्टी की सीटें बढ़ें या घटें, एक बात तय है कि चुनाव आयोग की साख निश्चित ही घट रही है। मतदान के आंकड़ों के बारे में हुए विवाद ने चुनाव आयोग की गिरती हुई साख को एक और धक्का पहुंचाया है। अभी से ही यह नहीं मान लेना चाहिए कि मतदान में बहुत बड़ा घोटाला हुआ है। लेकिन जो चुनाव आयोग पहले ही शक के घेरे में है, इस विवाद में उसकी भूमिका, उसकी चुप्पी और उसकी प्रतिक्रिया, सभी ने शक को पहले से ज्यादा गहरा किया है। एक सर्वेक्षण के अनुसार, 1996 में चुनाव आयोग पर भरोसा करने वाले 77 प्रतिशत थे और भरोसा न करने वाले 23 प्रतिशत। इसी तरह 2019 के चुनाव में भरोसा करने वाले 78 प्रतिशत और भरोसा न करने वाले केवल 12 प्रतिशत थे। लेकिन इस वर्ष उसी संस्था द्वारा कराए गए चुनाव पूर्व सर्वेक्षण में चुनाव आयोग में भरोसा रखने वालों की संख्या घटकर केवल 58 प्रतिशत रह गई, जबकि भरोसा न करने वालों की संख्या बढ़कर 23 प्रतिशत हो गई है। चुनाव आयोग जैसी महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था की साख में गिरावट लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बेहद संगीन मुद्दा है। चुनाव की घोषणा से महज एक सप्ताह पहले दो नए चुनाव आयुक्तों की अजीबो-गरीब नियुक्ति ने इस शक को और भी गहरा कर दिया था। चुनाव आयोग की जिम्मेदारी थी कि वह अपने कामकाज से अपनी गिरती हुई साख को दोबारा हासिल करे लेकिन दुर्भाग्यवश, चुनाव की घोषणा से अब तक मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों आयुक्तों के काम-काज ने इस संस्था के कद को घटाया है और इस संदेह को जन्म दिया है कि इस पवित्र संस्था में संवैधानिक पद पर बैठे अफसर सत्ताधारी दल के इशारे पर काम कर रहे हैं। मतदान के आंकड़ों के बारे में हुए विवाद को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। दुर्भाग्यवश इस चुनाव आयोग के बारे में किसी भी सही-गलत आरोप को बहुत लोग शुरू से ही सच मानने को तैयार हो जाते हैं। ऐसा ही कुछ पहले दो दौर के मतदान के आंकड़ों के बारे में हुआ। इस बार चुनाव आयोग ने बिना कोई कारण बताए और बिना पहले से सूचना दिए मतदान के आंकड़े जारी करने की स्थापित परिपाटी में तीन बड़े बदलाव किए। पहला, चुनाव के दिन तक और मतदान के बाद भी प्रत्येक संसदीय क्षेत्र के कुल पंजीकृत मतदाताओं की संख्या घोषित नहीं की गई। दूसरा, चुनाव पूरा होने के 24 घंटे के भीतर मतदान के अंतिम आंकड़े देने की बजाय, इन आंकड़ों को एक एप पर डाल दिया गया, जिसमें अंतरिम आंकड़े 24 घंटे के बाद भी बदलते रहे। अंतिम आंकड़ों की घोषणा पहले दौर के मतदान के 11 दिन बाद, यानी 30 अप्रैल को की गई और वह भी अखबारों में छपे सवालों और आलोचना के बाद। तीसरा, इतने विवाद के बाद भी जो आंकड़े प्रकाशित किए गए, उनमें केवल वोट प्रतिशत दिया गया, वोटों की पूरी संख्या नहीं दी गई। चुनाव आयोग की जिम्मेदारी थी कि वह इन शंकाओं का समाधान करे। चुनाव आयोग ने खरगे जी द्वारा उठाए सवालों पर सफाई भी पेश की, लेकिन अजीबो-गरीब तर्क के सहारे। चुनाव आयोग ने दावा किया कि मतदान के आंकड़ों में इतनी देरी सामान्य है। चुनावों को 35 वर्ष तक देखने के आधार पर मैं कह सकता हूं कि यह बात सरासर झूठ है। जहां तक मुझे ध्यान पड़ता है, किसी भी लोकसभा चुनाव में मतदाताओं या मतदान की संख्या के बारे में बड़ा विवाद पहले कभी नहीं हुआ। लेकिन इसमें ईमानदारी और पारदर्शिता बरतने की बजाय चुनाव आयोग ने होशियारी, छिपाव और धमकाने का सहारा लिया है। चुनाव आयोग के इस रुख से इस संवैधानिक संस्था की साख को और धक्का लगा है।