किस दबाव मे है सरकार

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पहले भी अपने फैसले पलट चुकी है या यू टर्न कर चुकी है। जिस समय भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार थी तब भी पहले कार्यकाल में नरेंद्र मोदी सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव का बिल वापस लिया था। दूसरे कार्यकाल में किसानों के आंदोलन की वजह से तीन केंद्रीय कृषि कानूनों को वापस लिया गया। लोकतंत्र में यह कोई अनहोनी नहीं है। जन दबाव में सरकारों को फैसले पलटने होते हैं। लेकिन तीसरी बार सरकार बनाने के बाद जितनी जल्दी जल्दी सरकार फैसले पलट रही है या फैसलों पर ब्रेक लगा रही है वह हैरान करने वाला है। सबसे ज्यादा हैरानी इस बात को लेकर है कि सरकार को इन मामलों की संवेदनशीलता का पता है फिर भी क्यों फैसले हो रहे हैं और क्यों वापस हो रहे हैं? क्यो मोदी सरकार बैकफुट पर आ चुकी है? लगातार रहे उलटफेर या यू-टर्न से तो यही संकेत मिलता है। फिर चाहे वो अनुसूचित जातियों में क्रीमी लेयर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को वापस लेना हो या फिर लेटरल एंट्री पर यू-टर्न। सरकार के इस रुख को देखकर तो लगता है यही लगता है जैसे कुछ लोग मजाकिया अंदाज में कहते हैं कि सरकार को’दलित ब्राह्मणों’ को नाराज करने का डर है। सरकार के यू टर्न लेने के बाद यही सवाल उठ रहा है कि अब राष्ट्र प्रथम के बीजेपी के एजेंडे का क्या हुआ?इसके अलावा भी कई ऐसे विवादास्पद मुद्दे भी हैं जो ठंडे बस्ते में पड़े हुए हैं। समान नागरिक संहिता (यूसीसी), वक्फ बोर्ड संशोधन विधेयक 2024, डिजिटल इंडिया अधिनियम और नई औद्योगिक नीति सहित कई आर्थिक सुधारों को टाला जा सकता है। इसके बजाय, सरकार को जाति जनगणना के लिए विपक्ष की मांगों का सामना करना होगा। वहीं दूसरी ओर किसानों ने फिर से आंदोलन और विरोध प्रदर्शन करने की बात कही है। इधर बेरोजगारी और आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रहे युवा भी सरकार के खिलाफ खड़े हो रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रणनीति विदेशी मोर्चे पर ध्यान केंद्रित करने की है। ये बात रूस, यूक्रेन की हालिया यात्राओं और सितंबर में होने वाली अमेरिका दौरे से पता चलता है। हालांकि इन उपायों के आंशिक रूप से ही सफल होने की संभावना है।दरअसल मोदी की असली ताकत उनकी चुनावी जीत और लोगों के समर्थन से आती है। विदेशी नेताओं को गले लगाने और दुनिया में भारत के बढ़ते महत्व के कुछ हद तक बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावों से नहीं। कौन इस बात से इनकार कर सकता है कि चुनावी तौर पर वे बैकफुट पर हैं, उतने मजबूत नहीं हैं, जितने वे होना चाहते थे? तो फिर, इससे बाहर निकलने का रास्ता क्या है?अब सवाल है कि क्या सचमुच नरेंद्र मोदी की सरकार बहुत कमजोर हो गई है और उसका अपना बहुमत नहीं है, जिसकी वजह से इन तीन मौकों पर सरकार झुकी है और उसने यू टर्न किया है? या किसी खास रणनीति के तहत जान बूझकर सरकार की ओर से विवादित मसले आगे किए जा रहे हैं और फिर पीछे हटा जा रहा है ताकि देश के मतदाताओं में यह मैसेज बने कि भाजपा को बहुमत नहीं देने का क्या नुकसान हो रहा है? एक दूसरी चर्चा यह कि लैटरल एंट्री पर जान बूझकर विवाद कराया गया ताकि उसमें आरक्षण लागू किया जा सके। इसी तरह वक्फ बोर्ड कानून को भी जेपीसी के पास इसलिए भेजा गया ताकि यह मैसेज बने कि सभी पार्टियों से सलाह मशविरा करके इसे लागू किया जा रहा है। सरकार ने इस तरह कुछ समय भी हासिल किया है ताकि राज्यसभा में उसका बहुमत हो जाए। बहरहाल, परदे के पीछे कारण चाहे जो हो लेकिन यह सरल मामला नहीं है। इसे उस तरह देखने की जरुरत नहीं है, जैसे दिखाया जा रहा है।

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