सुप्रीम कोर्ट ने जबरन एसिड पिलाए जाने (Internal Acid Attack) के मामलों पर सख्त और कड़ा रुख अपनाया है। चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने गुरुवार (11 दिसंबर, 2025) को कहा है कि ऐसे मामलों को हत्या के प्रयास (Section 307) की तरह देखते हुए मुकदमा चलाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि आरोपी को आसानी से ज़मानत नहीं मिलनी चाहिए और “ऐसे लोग समाज में आज़ाद घूमने के हकदार नहीं हैं।”
कोर्ट ने यह टिप्पणी एसिड अटैक पीड़िता शाहीन मलिक की याचिका को सुनते हुए की, जिन्होंने एसिड पिलाए जाने से अंदरूनी क्षति झेलने वाले पीड़ितों के लिए दिव्यांग का दर्जा देने की मांग की है।
आंतरिक एसिड पीड़ितों को भी मिलेगा दिव्यांग का दर्जा
याचिका में कोर्ट को बताया गया कि जिन लोगों के चेहरे या शरीर पर एसिड डाला जाता है, उन्हें पर्सन्स विद डिसेबिलिटी एक्ट, 2016 के तहत दिव्यांग का दर्जा मिलता है, लेकिन जिन्हें एसिड पिला दिया गया है (जिससे आहार नली समेत अंदरूनी अंग जल जाते हैं), उन्हें ऐसा कोई दर्जा नहीं दिया जाता है।
- सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत में माना कि कानून में विसंगति है।
- उन्होंने कहा कि कानून में उचित बदलाव किया जाएगा ताकि एसिड पिलाए जाने से अंदरूनी क्षति उठाने वाले लोगों को भी दिव्यांग का दर्जा देकर सभी जरूरी सुविधाएं दी जा सकें।
- कोर्ट ने सरकार को इसके लिए समय देते हुए 6 सप्ताह बाद आगे सुनवाई की बात कही।
‘कानून के शासन के लिए खतरा हैं ऐसे लोग’
एसिड पिलाए जाने की घटनाओं पर चिंता जताते हुए कोर्ट ने आरोपियों से सख्ती की ज़रूरत बताई। कोर्ट ने कहा:
“इस पर किसी दूसरी राय की कोई गुंजाइश नहीं कि ऐसे मामलों में धारा 307 के तहत मुकदमा चलना चाहिए। कानून में ऐसे जघन्य और अमानवीय मामलों के लिए विशेष प्रावधान जोड़ा जाने की ज़रूरत है। ऐसे लोगों को समाज में घूमने का कोई अधिकार नहीं है। वह कानून के शासन के लिए खतरा हैं।”
याचिकाकर्ता शाहीन मलिक खुद एसिड अटैक पीड़िता हैं, जिन पर 2009 में पानीपत, हरियाणा में एसिड डाला गया था। उनका मुकदमा अभी भी जारी है, लेकिन वह अपने जैसे दूसरे पीड़ितों के अधिकारों के लिए भी लड़ रही हैं।