नई दिल्ली। जम्मू-कश्मीर को दोबारा राज्य का दर्जा देने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को अहम सुनवाई हुई। केंद्र सरकार ने इस दौरान कहा कि वह इन याचिकाओं पर अपना विस्तृत जवाब दाखिल करेगी। कोर्ट ने केंद्र को समय देते हुए सुनवाई को चार सप्ताह के लिए टाल दिया।
केंद्र ने याचिकाकर्ताओं की मंशा पर उठाए सवाल
मुख्य न्यायाधीश भूषण रामकृष्ण गवई और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ के सामने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र सरकार की ओर से पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि इस मामले में फैसला लेते समय “पहलगाम जैसी घटनाओं” को भी ध्यान में रखना होगा। मेहता ने कहा, “इस बारे में निर्णय जम्मू-कश्मीर सरकार से बातचीत के बाद लिया जाएगा। लेकिन कोर्ट में पहुंचे कुछ याचिकाकर्ताओं की दिलचस्पी जम्मू-कश्मीर की वास्तविक स्थिति सुधारने में नहीं, बल्कि दुनिया के सामने भारत को बदनाम करने में ज्यादा लगती है।”
केंद्र का दावा- अनुच्छेद 370 हटने के बाद तेजी से हुआ विकास
तुषार मेहता ने आगे कहा, “2019 में अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावी होने के बाद जम्मू-कश्मीर में अभूतपूर्व विकास हुआ है। आज क्षेत्र में शांति है और आम नागरिक खुश हैं।” कोर्ट ने केंद्र की इस दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि फैसला जमीनी हकीकत को देखते हुए ही लिया जाएगा।
याचिकाकर्ताओं का पक्ष
जहूर अहमद बट, खुर्शीद अहमद मलिक और अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायण और मेनका गुरुस्वामी ने पैरवी की। उनका कहना था कि अनुच्छेद 370 मामले पर 2023 में फैसला सुनाते समय सुप्रीम कोर्ट ने खुद केंद्र सरकार के उस आश्वासन को दर्ज किया था जिसमें कहा गया था कि जम्मू-कश्मीर को बाद में राज्य का दर्जा दिया जाएगा। याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से इस वादे को लागू करने की मांग की।
गौरतलब है कि अगस्त 2019 में संसद ने अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी कर जम्मू-कश्मीर को मिले विशेष दर्जे को समाप्त कर दिया था। इसके साथ ही राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों—जम्मू-कश्मीर और लद्दाख—में विभाजित कर दिया गया था। 2023 में सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने केंद्र के इस कदम को संवैधानिक और सही ठहराया था।