नई दिल्ली: बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (Special Intensive Revision – SIR) को लेकर दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि निर्वाचन आयोग की दस्तावेज जांच प्रक्रिया किसी भी तरह से मतदाता-विरोधी नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि यह कवायद मतदाताओं की सुविधा के लिए है, न कि उन्हें सूची से बाहर करने के लिए।
याचिकाकर्ता का दावा कोर्ट ने खारिज किया
बुधवार को जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की बेंच ने इस मामले की सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता के उस तर्क को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि यह प्रक्रिया लोगों को मतदाता सूची से बाहर करने का प्रयास है। अदालत ने अपने रुख को “मतदाता-अनुकूल” बताते हुए निर्वाचन आयोग के कदम का समर्थन किया।
अभिषेक मनु सिंघवी की दलील और कोर्ट की प्रतिक्रिया
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने दस्तावेज जांच अभियान को “एंटी वोटर” और “अलगाववादी” करार दिया। इस पर जस्टिस बागची ने कहा, “हम आपका आधार से जोड़कर अलगाव का तर्क समझते हैं। मगर बात दस्तावेजों की संख्या की है, जो असल में मतदाताओं के हक में है, उनके खिलाफ नहीं। जरा देखें, कितने सारे दस्तावेजों से आप नागरिकता साबित कर सकते हैं।”
“अगर 11 दस्तावेज मांगते हैं तो…”
जस्टिस बागची की बातों का समर्थन करते हुए जस्टिस सूर्य कांत ने टिप्पणी की, “आप कह रहे हैं कि अगर वे 11 दस्तावेजों की मांग करते हैं तो यह मतदाता विरोधी है। लेकिन अगर सिर्फ एक दस्तावेज मांगा जाए, तो…”
अदालत ने अंत में यह साफ कर दिया कि निर्वाचन आयोग का SIR अभियान मतदाताओं को अधिक विकल्प और सुविधा देने के लिए है, न कि उन्हें परेशान करने के लिए।