नहीं रोक सकते… यह अनुच्छेद 21 का उल्लंघन होगा; जमानत न देने पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अदालतों को कड़ी चेतावनी दी कि वे बिना ठोस कारण बताए जमानत आदेशों पर यांत्रिक तरीके से रोक लगाने से बचें। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी आरोपी को जमानत से वंचित करना केवल दुर्लभ और असाधारण मामलों में ही होना चाहिए, जहां स्थिति अत्यंत गंभीर हो।

न्यायमूर्ति अभय एस. ओका और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा, “अदालतें किसी आरोपी की स्वतंत्रता को लापरवाही से बाधित नहीं कर सकतीं। जमानत आदेश पर केवल तब ही रोक लगाई जानी चाहिए जब मामला वास्तव में गंभीर हो, जैसे कि आतंकवादी गतिविधियों में संलिप्तता, आदेश का विकृत होना या कानून के प्रावधानों का उल्लंघन होना।”

पीठ ने कहा कि स्वतंत्रता को इस तरह से प्रतिबंधित करना संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन होगा, जो हर नागरिक के जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा करता है। न्यायमूर्ति ओका ने टिप्पणी की, “जब तक वह आतंकवादी नहीं है, तब तक जमानत पर रोक लगाने का कोई कारण नहीं होना चाहिए।”

यह टिप्पणियां धन शोधन के एक मामले में आरोपी परविंदर सिंह खुराना की याचिका पर आईं। खुराना ने निचली अदालत द्वारा दी गई जमानत पर दिल्ली उच्च कोर्ट द्वारा लगाई गई अस्थायी रोक को चुनौती दी थी। पिछले साल 17 जून को पीएमएलए मामले में ट्रायल कोर्ट ने खुराना को ज़मानत दी थी, लेकिन हाईकोर्ट ने इस आदेश पर रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने 7 जून को हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाते हुए खुराना की जमानत बहाल कर दी थी।

इस फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों को स्पष्ट संदेश दिया है कि जमानत आदेशों पर लापरवाही से रोक लगाना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अदालतों को निर्देश दिया गया है कि वे जमानत के मामलों में उचित सावधानी बरतें और केवल अत्यंत गंभीर परिस्थितियों में ही जमानत आदेश पर रोक लगाएं।

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