विरासत टैक्स की बहस UPA काल में चिदंबरम ने शुरू की थी, राजीव गांधी ने क्यों खत्म किया था नियम

कांग्रेस नेता राहुल गांधी लगातार संपत्ति के पुनर्वितरण की बात दोहरा रहे हैं। इस बीच कांग्रेस के ही सीनियर नेता सैम पित्रोदा ने अमेरिका का हवाला देते हुए विरासत टैक्स का जिक्र किया है।उन्होंने कहा कि अमेरिका में विरासत पर टैक्स लगता है और यदि कोई मर जाता है तो उसकी 55 फीसदी संपत्ति सरकार के पास जाती है। इसके बाद बची हुई 45 फीसदी दौलत ही परिवार को मिलती है। उनके इस बयान को पीएम नरेंद्र मोदी और भाजपा ने मुद्दा बना लिया है। पीएम मोदी तो सीधे तौर पर हमलावर हैं और कह रहे हैं कि कांग्रेस देश की जनता की संपत्ति लूटना चाहती है। वे लोग इस संपत्ति को लेना चाहते हैं, जिन्होंने कांग्रेस को ही विरासत के तौर पर इस्तेमाल किया था।

विरासत टैक्स पर चुनावी मौसम में बहस तेज हो गई है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि भारत में यह पहले भी था। यही नहीं इसे खत्म करने वाले कांग्रेस के ही प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे। उनकी सरकार के दौर में वित्त मंत्री रहे वीपी सिंह 1985 में प्रस्ताव लाए थे और तब एस्टेट ड्यूटी टैक्स कहे जाने वाले इस कर को खत्म किया गया था। भारत में इसे 1953 में यह कहते हुए लाया गया था कि इससे आर्थिक गैरबराबरी का खात्मा होगा। लेकिन ऐसा कुछ हो नहीं सका और अंत में वीपी सिंह ने यह कहते हुए इस टैक्स को खत्म करने का प्रस्ताव पेश किया कि यह अपने मकसद को पूरा करने में असफल रहा है।

भारत में 1953 में एस्टेट ड्यूटी टैक्स के तहत किसी परिजन के गुजरने पर उसके बच्चों या पोते और पोतियों को मिलने वाली संपत्ति पर 85 फीसदी तक का टैक्स लगता था। हालांकि इस टैक्स के दायरे में तब देश के सुपर रिच लोग ही आते थे। उस दौर में यह नियम था कि यदि किसी की अचल और चल संपत्ति 20 लाख रुपये से अधिक की है तो उस पर 85 पर्सेंट तक का टैक्स लगता था। हालांकि उस दौर में किसी संपत्ति का 20 लाख रुपये मूल्य होना बड़ी बात थी। ऐसे में इसके दायरे में कम ही लोग आते थे। शायद यही वजह थी कि इससे सरकार को ज्यादा लाभ नहीं होता था।

उस दौर में विरासत वाले इस टैक्स को लेकर यह भी नियम था कि यदि किसी व्यक्ति को लग रहा है कि उसकी सेहत खराब है और मृत्यु कभी भी हो सकती है तो वह गिफ्ट नहीं दे सकता। इसके अलावा मृत्यु से दो साल पहले गिफ्ट में दी गई संपत्ति पर भी टैक्स का प्रावधान था। इसकी वजह यह थी कि टैक्स बचाने की कोशिशों को रोका जा सके। फिर भी इससे कमाई बहुत कम थी। इसके अलावा गैर-बराबरी दूर करने वाले दावे भी गलत साबित हुए थे।

गौरतलब है कि इस टैक्स को वापस लाने की बहस पी. चिदंबरम ने 2013 में ही शुरू कर दी थी। वह तब वित्त मंत्री थे और उन्होंने इसका जिक्र किया था। चिदंबरम के बयान पर कारोबारी संगठनों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी और कहा था कि यह पीछे ले जाने वाला सिस्टम होगा। चिदंबरम ने 2012 के आखिरी दौर में कहा था, ‘कई बार मुझे लगता है कि हमने टैक्स में बहुत ढील दे रखी है। क्या हम इस ओर ध्यान दे रहे हैं कि दौलत कुछ ही लोगों तक सिमट रही है। फिर भी मैं यह कहने से हिचक रहा हूं कि हमें विरासत टैक्स ले आना चाहिए।’

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